फरीदाबाद। दलित चिंतक, सूचना का अधिकार कार्यकर्ता और डॉ. बीआर अंबेडकर

एजुकेशन सोसाइटी के चेयरमैन ओपी धामा ने प्रधानमंत्री तथा राष्ट्रपति को पत्र लिख कर मांग की है कि अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लोगों को जातिगत आधार पर दिए गए आरक्षण एवं अन्य सुविधाओं के प्रति समाज में फैली भ्रांतियों को दूर करने की आवश्यकता है। आरक्षण तथा अन्य सुविधाओं के लाभ की पहुंच आखिर 70 साल बाद भी इस अपेक्षित-वंचित समाज तक क्यों नहीं पहुंच सकी? इसके मद्देनजर केंद्र सरकार एक राष्ट्रीय समीक्षा आयोग का गठन करे।ओपी धामा मंगलवार को बौद्ध विहार स्थित डॉ. बीआर अंबेडकर शिक्षण संस्थान के सभागार में पत्रकारवार्ता कर रहे थे। उन्होंने कहा की प्रस्तावित अनुसूचित जाति जनजाति राष्ट्रीय समीक्षा आयोग यह समीक्षा करें के आरक्षण का लाभ इन वर्गों को अभी तक क्यों नहीं मिला? इसके क्या कारण रहे हैं? इसके लिए कौन लोग जिम्मेदार हैं? तथा निर्धारित आरक्षण कैसे इन वर्गों तक शीघ्र अति शीघ्र पहुंचे। उन्होंने कहा के भारतीय समाज जाति आधारित समाज है यहां अनेक जातियां हैं, इनमें से कई ऐसी जातियां हैं जो ऐतिहासिक कारण, अवसरों के अभाव में पिछड़ गई, इन्हीं कारणों से भारत के संविधान में राष्ट्र के सर्वांगीण विकास, सामाजिक ताना-बाना को बनाए रखने और सामाजिक समरसता कायम रखने के लिए वंचित तबके को भी प्रगति की राह पर लाने के लिए संविधान में अतिरिक्त सहूलियत दी गई थी। लेकिन आजादी के 70 वर्ष बाद भी आरक्षण एवं अन्य सुविधाओं का लाभ लोगों तक अभी तक नहीं पहुंच पाया। उन्होनें कहा के सो नौकरियों में, साढे साता्रतिशत आरक्षण अनुसूचित जनजातियों के लिए हैं, 15त्न आरक्षण अनुसूचित जातियों के लिए है, 27त्न आरक्षण पिछड़ा वर्ग के लिए है। जिसका टोटल साढे 49त्न बनता है। जबकि इन वर्गों की कुल आबादी 80त्न से ऊपर है। बकाया साढे 50त्न आरक्षण सामान्य वर्ग के लिए है जिनकी जनसंख्या 20त्न से कम है। अर्थात 20त्न लोगों के पास सरकारी नौकरियों में साढे 50त्न आरक्षण है और अन्य जातियों के लिए जिनकी आबादी 80त्न है। इनको साढे 49त्न आरक्षण है। यह केवल कुछ सरकारी नौकरियों में है। सेना में, उच्च न्यायिक सेवा में, निजी क्षेत्र में और अन्य बहुत सी सरकारी नौकरियों में आरक्षण व्यवस्था नहीं है। केंद्र सरकार में सचिव, अतिरिक्त सचिव, संयुक्त सचिव वह निदेशक के पदों पर अनुसूचित जाति एवं जनजाति के नाममात्र के अधिकारी हैं। इसी तरह से केंद्रीय विद्यालयों में अनुसूचित जाति जनजाति के अध्यापकों के सैकड़ों पद खाली पड़े, लेकिन लोगों में एक भरम है के अनुसूचित जाति जनजाति को दिए गए आरक्षण के कारण योग्य व्यक्तियो को नौकरियां प्राप्त नहीं हो रही जबकि ऐसा नहीं है। आरक्षण का मामला केवल रोजगार का ही मामला नहीं है यह सामाजिक समानता और आर्थिक संसाधनों में हिस्सेदारी का भी है लेकिन कुछ लोग रोजगार तक सीमित रखना चाहते हैं।

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