बेंत और बांस के उत्पाद से पुश्तैनी हुनर को जिंदा रखने के साथ-साथ रोजी-रोटी का जरिया बनाया

सूरजकुंड (फरीदाबाद), 04 अप्रैल। अपने पुश्तैनी हुनर को जिंदा रखने के साथ-साथ असम के बाशेद अली बेंत और बांस के उत्पाद बनाकर एक तरफ जहां प्रधानमंत्री के वोकल फोर लोकल के नारे को चरितार्थ कर रहा है वही दूसरी तरफ प्लास्टिक से दूर रहकर इन आइटम के माध्यम से पर्यावरण का भी संदेश ले रहा। सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय हस्तशिल्प मेले में यह आइटम पर्यटकों को काफी भा रहे हैं।
बिहार के राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग वित्त एवं विकास निगम की सहायता से बाशेद अली ने अपने बाप-दादा के हुनर को आगे बढ़ाते हुए मॉडर्न रूप देकर बाजार में अलग ही जगह बना ली है। उनके स्टाल नंबर 345 पर कप, प्लेट, गिलास, फ्लावर पोट, हैंगर लैंप, कुर्सी, टेबल, मूढे व अन्य घरेलू उत्पाद पर्यटकों को खूब लुभा रहे हैं। अब यह कार्य उसकी रोजी-रोटी का मुख्य स्रोत बन गया है।
उन्होंने बताया कि वे इस तरह के मेलों में हमेशा आते हैं। उनके द्वारा बनाए गए बेंत और बांस के आइटम देशभर में भेजे जाते हैं। बांस के बने इन उत्पादों से एक तरफ जहां असम में किसानों को इसकी खेती करने से उस पर बहुत अच्छे दाम मिल रहे हैं वहीं इस आइटम को बनाने में हमारे ग्रुप के सैकड़ों लोगों को रोजगार मिल रहा है।
उन्होंने बताया कि बांस के बने इन उत्पादों में रखी गई खाद्य सामग्री काफी देर तक खराब नहीं होती। इन उत्पादों के लिए जब हम किसी भी मेटल का प्रयोग करते हैं तो उसका कहीं न कहीं हमारे पर्यावरण पर भी विपरीत असर पड़ता है। यह आइटम अन्य मेटल के आइटम से भले ही थोड़ा महंगा है लेकिन खाद्य सामग्री को सुरक्षित रखने तथा पर्यावरण को बचाने के लिए इनका प्रयोग बहुत जरूरी है।
उन्होंने बताया कि इस बार उनकी बिक्री अच्छी हुई है। इस स्टॉल पर लगे आइटम पर्यटकों को लुभा रहे हैं। अब धीरे-धीरे बैंत की कुर्सियों व टेबल का चलन बढ़ रहा है जो बहुत ही अच्छा संकेत है।

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